यादें

 

 

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जुस्तजु तेरे प्यार की तेरी नज़र का सूरूर। तुझे माँगना खुदा से हर दुआ में मेरे हुज़ूर।

बात दिल्लागी की थी या फिर दिल लगाने की अदा। सजदा झुक के किया या फिर झुका के नज़रें सदा।

उन लमहों की यादें तेरे जलवों का नशा। या कोई चिलमन के पीछे उन शोख़ नज़रों की अदा।

तुम ही तुम रही मेरी आँखों का नूर हर लम्हा। वो पलकें उठा के गिराने का फ़लसफ़ा।

तेरे ख़ुतुत तेरे अल्फ़ाज़ तेरी शोख़ नज़रों का ख़ज़ाना। बस यही रह गया मेरे पास तेरे इश्क़ का नज़राना।

तुम रूखसत हुई ज़माना हो गया। मैं अपने ही घर में बेग़ाना हो गया।

आज भी जब शोख़ नज़रें लिए मेरी गलियों से कोई गुज़र जाता है।

तेरा सुर्ख़ जोड़े में सज कर किसी और के साथ जाना याद आता है।

COMPASSION

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lets not be carried away for the treasure we own
lets stick to the values we have inherited from our own

*
the tenacity of love and will to grow
only the purest form of the blood to flow

*
my urge to connect the vessels of blood
to the humanity and humans for message to spread

*
the flower sparkles with the aroma of love
by keeping the racism, regionalism and religions above

*
it spreads the smiles and adores the crown
without caring for black, yellow,white or brown

*
lets bloom like charms of all season flower
compassionate emphatic like the gratifying power

धुआँ

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फिर बुलंदी का एहसास क्यूँ धुएँ को अक्सर होता है।

इसके आने के बाद तो हर आशिक़ ता उम्र रोता है।

वो आग जो लगी रहती है दिल में कई बरसों तक।

उसके बुझने से कहाँ दर्द कम किसी का होता है।

बड़ी शिद्दत से जिसको चाहा और पूजा हमने।

हर तनहायी में तनहा हुए हम उनसे बिछुड़ने के बाद।

याद रह गयी बस उनसे मिलने की आख़िरी तारीख़।

क़दम लड़खड़ाए लड़खड़ा के सम्भले फिर लड़खड़ाए उनके जाने के बाद।

वो आज भी मुस्कुराते हुए चले आते हैं ख़यालों में अपने।

सुकून सा दिखता है उनकी आँखों में हमें करके बर्बाद।

ऐ खुदा गर तेरे दर पे यही होना है हर आशिक़ का अंजाम।

यहीं बैठे रहो बुत बनके कौन करेगा तुमसे कभी कोई अपने दिल की फ़रियाद।

Savera

Life

 

इक बार फिर सुबह लोट आइ अंधेरों को शिकस्त दे कर।

वो रात जो इतराया करती थी हर ग़म को अपनी आग़ोश में छुपा कर

एक नई ज़िंदगी का आग़ाज़ कराने ले जाती थी दूर कहीं कुछ पल के लिए

कुछ ख़ूबसूरत दिखते चेहरे सुबह की लकीरों का दर्द छुपाकर करते थे जीने की कोशिश।

किसी को चाहत थी दूर तक जाने की किसी को भूलना था सब कुछ धुआँ उड़ाते हुए

दर्द छुपा देती थी उस काली चादर के पीछे ये रात अपनी झूठी ताक़त से

कुछ यूँ ही इंसान जी रहा अपना सच छुपा कर दिल में दर्द लिये

क्यूँ ना ऐतबार करें क़ुदरत की अज़ीम बादशाहत पर

जो रखती है हर शकस की तक़दीर का हिसाब हर पल के लिए

सुबह की पहली किरण पहना देती हैं असली जामा हर चेहरे पे

जब अंधेरा झुका के अपनी नज़रें चल देता है सुबह को सलाम कर के।

 

 

 

 

 

India will spend $60 million on Weather Forecast Supercomputer

 

And how badly was it required by India where the agriculture depends entirely on rains and farmers keep on committing suicide for failure of crops

 

 

After decades of statistical juggling, India is preparing to go hi-tech with weather forecast. Millions of lives—119 million in the farming sector alone—are dependent on monsoon rains, which account for 70% of the precipitation the subcontinent receives every year. Correctly foretelling the monsoon has become all the more critical in recent times, with India suffering…

via Beating the Gods: India will spend $60 million on a supercomputer to predict the monsoon — Quartz

बरसात

 

बरस के कुछ यूँ निकली। सावन की वो काली घटा   झूमती इतराती अब किसी और की बुझाएगी प्यास। शायद बेख़बर!!  कभी होंठों तक नहीं पहुँच पाता अपने हाथों में भरा जाम। बस हमें भी भी उनके गेसुओं की  याद आ गई, हर बार बरस जाते थे उनके कजरारे नैन मेरे शानो पे अपनी घटायें रख कर।वो अश्क़ आँखों से गिर कर उनके सुर्ख़ लबों पे ठहर जाते थे ओस की बूँदे बनकर  और हम प्यासे रह  जाते थे हर बार उस रिमझिम बरसात के बाद। आज भी बरसात की बूँदे साथ देती हैं मेरी बरसती आँखों का जब भी  होता है उनके पास होने का एहसास